छात्रों का असंतोष बढ़ रहा है । छात्र सड़कों पर आ रहे हैं । सार्वजनिक संपत्ति की हानि हो रही है । सामान्य जान जीवन अस्तव्यस्त हो रहा है । कुछ छात्रों ने खुदकुशी तक कर ली हैं । सरकार के खिलाफ प्रायोजित आंदोलनों की तोपे गर्ज रही हैं । सरकार भी सकते में है । कार्यवाहियां तेजी से हो रहीं हैं । इस सब के बीच मुख्य मुद्दे पीछे छूट गए हैं। हमारा राष्ट्र प्रेम कहीं खो गया है । जिस राष्ट्र को हम बनाने के कसमें खा रहे थे वो कसमें बदल रही हैं । उसी अपने भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को इसी राष्ट्र के दीपक धूल में मिलने को आतुर हैं। शायद हम अपना रास्ता भटक रहें हैं। गंदी राजनीति की सारी तोपे छात्रों के कंधों पर चलकर उनके भविष्य की अर्थी निकली जा रही है। वो छात्र जो इस देश का भविष्य हैं , घिनौने देश विरोधी षड्यंत्रों की राजनीति के बीच फँसकर पीस रहे हैं । उनका जीवन दिशा हीन होकर बर्बाद हो रहा है । अभिभावक परेशान हैं ।आख़िर क्यों ? क्यों हम अपने बच्चों को डाल डाल की रह पर धकेल रहें ? क्यों छात्रों की समस्यानें बार बार राजनीतिज्ञों के लिए ईशान बन जाती है? गंदी राजनीति की आग में क्यों छात्रों की भावनाओं की होली जलाई जाती है? क्या सड़कों पर उपद्रवियों की भीड़ छात्रों की किसी समस्या को हल कर सकती है? क्या किसी मंत्री के त्यागपत्र से तुरंत समस्यायें हाल हो सकती हैं ? क्या गारंटी है कि भविष्य में किसी से कोई गलती नहीं होगी ? चोर चोरी करना छोड़ देंगे? छात्र सफलता के शिखर छू लेंगे ?आंदोलन होते हैं , मुद्दे पीछे छूट जाते हैं । कुछ युवाओं का भविष्य हमेशा के लिए बर्बाद हो जाता है, उपज के तो पर एक दो नेता पैदा हो जाते हैं । संसद में तथाकथित क्रांतिकारियों को स्थान मिल जाता है और फिर भेंस पूरे तालाब को गंदा करने लगती है । बस यही चक्र तो चल रहा है ।
आज का छात्र मासूम है, नासमझ है, उसे अपने भविष्य का मार ज्ञात नहीं? ऐसा सोचना मूर्खता है । वास्तव में हम उसे उलझा रहे हैं। राजनेता अपने स्वार्थ के लिए उनका प्रयोग कर रहे हैं।
समस्या गंभीर है लेकिन लाइलाज नहीं। सबसे पहले अभिभावकों को आगे आकर पहल करनी होगी । यकीन मानिए इन बीमारी का पहला वायरस अभिभावकों से ही उत्पन्न होता है । स्कूल में प्रवेश से आरंभ होकर उनके किसी मंजिल तक पहुंचने में अभिभावकों का निरंतर बढ़ता मानसिक दबाव अपने ही बच्चों के विकास में पहली बाधा है । बच्चा कुछ बनने की स्थिति में आता है तो सुबह शाम अभिभावकों के प्रश्न, कुछ करने का दबाव , दूसरे बच्चों की सफलता के ताने उसके मस्तिष्क में एक अलग सा तनाव पैदा करते हैं । बस यही स्थिति से अधिकतर छात्र विचलित होने लगते हैं। उनका दिमाग़ घूमने लगता है। यह समय अभिभावकों के धर्य बनाये रखने का होता है । ऐसे समय अभिभावक धैर्यपूर्वक अपने बच्चों के साथ सहयोग करें। उनका मनोबल बनाए । ध्यान रखें यही समय है जब सूरी और आसुरी शक्तियां उसे अपनी अपनी और आकर्षित करती हैं। उसे अपना मार्ग चुनना होता है । वो मार्ग जिस पर उसे अपनी मंज़िल तक पहुँचना है । ध्यान भटका तो रास्ता भटक जाएगा। लक्ष्य विलुप्त हो जाएगा और असमंजस की ढूंड उसे घेर लेगी। बस इस समय अपने बच्चों को उस अंधकार से बचाकर प्रकाश की और ले जाना है । यह अभिभावकों का कर्तव्य है की अपने बच्चों को सबसे पहले आंदोलनों की गंदी राजनीति की दल दल में गाड़ने से बचायें रखें। इस दल-दल में फँसकर आज तक किसी का भविष्य नहीं बना।।
दूसरी बात अपने युवा छात्रों से कहना चाहता हूँ । क्या आपका अपना कोई विवेक नहीं ? बड़े बड़े सपने बुननेवाले आपकेमस्तिष्क क्या इतने विवेक शून्य हो जाते हैं कि आपकी तर्क शक्ति जवाब देने लगती है । आपने जीवन में कितनी गलतियाँ की होंगी क्या आपसे आपके परिवार ने त्याग पत्र कभी मांगा है? आपको कठिनाइयाँ हुई, माता पिता से आपकी इच्छाएँ पूरी न हो सकी तो क्या आपने उनसे त्यागपत्र माँगा है? नहीं क्योंकि यह किसी समस्या का अंतिम हल नहीं।जरा सोचिए क्या शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र से आपकी कोई समस्या हाल हो जाएगी ? क्या नीट की परीक्षा में असफल छात्र सफल घोषित हो जाएँगे ? वास्तव में कोई भी व्यवस्था पूर्णत: फूलप्रूफ नहीं होती । आप कितने भी सुरक्षा प्रबंध कर लें , अपराधी को अपराध करने से रोक नहीं सकते। बस अपराधी को दंड दिया जा सकता है और भविष्य के लिए सावधानी बढ़ायी है।कती है । वास्तविकता यह है कि छात्रों की समस्या का अधिग्रहण कर निहित स्वार्थी राजनीतिज्ञ विदेशी सहायता से अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। हानि किस की हो रही है? छात्र घायल हो रहे हैं , पुलिस कर्मी घायल हो रहें हैं, राष्ट्रीय संपत्ति नष्ट की जा रही है, बाह्य गुंडे अपराधी परवृत्ती के लोग अपना नंगा नाच दिखा रहे हैं । क्या किसी राजनीतिज्ञ को खरोंच भी आई है? देर सवेर वार्ता होगी , कुछ लीपापोती होगी , राजनीतिज्ञों को शायद कुछ लाभ मिले , सब शांत हो जाएगा और छात्र फिर से ठगे जाएँगे । हमारे देश में यही तो होता आया है ।
छात्रों का असंतोष स्वाभाविक और जायज़ है । उनका रोष प्रकट करना भी जायज़ है किंतु तरीका फलदायी नहीं है । छात्रों का यह सत्य बहुत कीमती और नाजुक होता है । यह उनके भविष्य को निश्चित दिशा देने का समय होता है । समय कभी लौटकर नहीं आता। अतः इस कीमती समय को किसी भी तरह नष्ट नहीं किया जाना चाहिए । वास्तव में यह कर्तव्य अभिभावकों और शासन में बैठे जिम्मेदार लोगों का है । छात्रों को अपनी समस्या अपने अभिभावकों के संज्ञान में लाकर अपने अध्यन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए । अभिभावकों को छात्रों की समस्याओं के लिए शासन से समय समय पर वार्ता कर हल निकालना चाहिए । इसके लिए अभिभावकों का ग्रुप बनाया जाना चाहिए । किसी भी दशा में छात्रों को राजनीति की दल दल से मुक्त रखना उनके भविष्य के लिए श्रेयस्कर होगा।
सरकार को चाहिए कि छात्रों के आक्रोश प्रदर्शन का गंभीरता से संज्ञान ले, उन्हें षड्यंत्रकारी स्वार्थी राजनीतिक तत्वों से पृथक करे। केवल छात्र प्रतिनिधियों से वार्ता करे और बाक़ी विध्वंस कर्ताओं, ठेकेदारों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। राष्ट्रीय संपत्ति को हानि पहुँचाने के लिए उकसाने वाले और छात्रों को गुमराह कर राष्ट्रीय युवा शक्ति को नष्ट करने वालों के विरुद्ध सीधे देश द्रोह का मुकदमा कर जेल भेजा जाना चाहिए । सरकार से अपेक्षा होती है कि किसी भी रोष ज्ञापन पर संबंधित पक्ष से तुरंत वार्ता करे जिससे किसी तृतीय पक्ष को अनावश्यक हस्तक्षेप का मौके न मिले।
छात्रों की समस्या नीट परीक्षा तक सीमित नहीं , बहुत समस्याएं हैं । कोचिंग माफियाओं का जाल उन्हें जकड़ता जा रहा है । देश के निर्माण में इसी वर्ग का भविष्य में बड़ा योगदान होने वाला है अतः इस और विशेष ध्यान केंद्रित कर उचित संशोधन और योजनाएं निर्धारित कर लागू करनी चाहिए ।
यह असंतोष छात्रों को सड़कों पर लेन के लिए ईंधन का काम करता है । पेट्रोल विदेशी एजेंट देते हैं और तिल्ली उनसे पैसे लेकर देश द्रोही नक्सल्ली और जिनके कारतूस राजनीतिक ठेकेदार जो अपने को नेता कहते हैं । जलता कौन है, वही निरीह छात्र, उनके भाई बहन और माता पिता और उनके साथ तिल तिल कर जलता ही यह हमारा देश ।
समझ नहीं आता कि इतनी सरल सी बात सरकार की समझ में क्यों नहीं आती। गुनहगार वो दिशाहीन छात्र नहीं जिनका गुस्सा फुट रहा है । गुनहगार कुछ चंद लोग हैं जो बार बार विदेशी सहायता से इस देश को जलाकर रख कर देना चाहते हैं और सबसे बड़ा दोष हमारी व्यवस्था पर है जो इन तत्वों से निपटने का पर्यास तो करती हैं लेकिन बार बार इन्हें जीवन दान देकर अपने आप को मानवीय कानूनों का पुजारी साबित करने में लगी रहती है ।
यदि समस्या की जड़ में जायें तो केवल दो ही उपाय द्वारा इस समस्या से निपटा जा सकता है ।
१ हमारी शिक्षा पद्धति को धीरे धीरे नष्ट किया गया हे ।शिक्षा में गुणवत्ता कम होती जा रही है । सर्टिफिकेट बाँटे जा रहे हैं । अवसर अपर्याप्त बन रहे हैं जिस कारण बेरोजगारी बढ़ रही है । शिक्षा का खुला अनियंत्रित कारोबार और रिजर्वेशन पालिसी का फार्मूला इसके मुख्य कारण हैं ।यदि सरकार शिक्षा में गुणवत्ता बढ़ाने, उसे रोजगार परक बनाकर, मेरिट के आधार पर रोजगार छात्रों को उपलब्ध कराने के लिए पालिसी जारी करे तो यह असंतोष बंद हो सकता है । सही योजना की आवश्यकता है । यह समस्या दिनों में नहीं कई वर्षों में समाप्त होगी बशर्ते तुरंत उचित नीति लागू हो ।
इससे जुड़ा दूसरा मुद्दा आंदोलन जीवियों का है जो टिड्डी दल की तरह संगठित होकर बार बार हमारी संप्रभुता पर हमला कर बड़ी हानि कर जाते हैं और फिर बिलों में घुस जाते हैं। हमारा कानून, सरकार का एटीएम बल कमजोर पद जाता है । सरकार को कमर कस के एक बार इन तत्वों से पूरी तरह निजात पानी होगी। योगी मॉडल की सफलता का उदाहरण सामने है ।
क्या राष्ट्र से बड़ा कोई व्यक्ति हो सकता है? कोई कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो उसे बिल से बाहर खींचकर जनता के सामने नंगा कर देना चाहिए। मार के आगे भूत भी नाचते हैं फिर क्यों नए नए राजनीतिक भूत पीड़ा हो रहे हैं?
इन सबके पीछे विदेशी फंडिंग और ब्लैक मनी का बड़ा योगदान है । सरकार चाहे तो एक कानून से एक ही दिन में सारी ब्लैक मनी , सारा हवाला कारोबार बंद हो सकता है लेकिन उसके लिए सरकार को स्वयं आत्मबल दिखाना होगा।
जनता समझ रही है बस सरकार सही भाषा में समझाना शुरू कर दे तो जानता इन्हें दोड़ा दौड़ा कर मारेगी जैसे बंगाल में।
सरकार युवा वर्ग के दर्द को समझे वो बेरोजगारी के कारण दिशा हीन होकर घूम रहे हैं उन्हें दिशा चाहिए फिर यह शक्ति विनाश के लिए क्यों ? राष्ट्र निर्माण के लिए क्यों नहीं ?
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