castism Archives - Tiranga Speaks https://tirangaspeaks.com/tag/castism/ Voice of Nation Fri, 20 Mar 2026 07:51:27 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.4 244437618 राष्ट्रीय राजनीतिक आचरण https://tirangaspeaks.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%86%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a4%a3/?utm_source=rss&utm_medium=rss&utm_campaign=%25e0%25a4%25b0%25e0%25a4%25be%25e0%25a4%25b7%25e0%25a5%258d%25e0%25a4%259f%25e0%25a5%258d%25e0%25a4%25b0%25e0%25a5%2580%25e0%25a4%25af-%25e0%25a4%25b0%25e0%25a4%25be%25e0%25a4%259c%25e0%25a4%25a8%25e0%25a5%2580%25e0%25a4%25a4%25e0%25a4%25bf%25e0%25a4%2595-%25e0%25a4%2586%25e0%25a4%259a%25e0%25a4%25b0%25e0%25a4%25a3 Fri, 20 Mar 2026 07:51:27 +0000 https://tirangaspeaks.com/?p=178 पिछले कुछ वर्षों से कुछ माननीयों का अशोभनीय आचरण देश के नागरिकों के लिए आश्चर्य का विषय बनता रहा है । कई बार तो स्थिति काफ़ी हास्यप्रद भी होती दिखायी पड़ती रही है । देश स्वतंत्र हुआ, अपना संविधान लागू हुआ जिसने समान नागरिक संहिता की भी कल्पना की गई किंतु यह संहिता सबसे पहले [...]

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पिछले कुछ वर्षों से कुछ माननीयों का अशोभनीय आचरण देश के नागरिकों के लिए आश्चर्य का विषय बनता रहा है । कई बार तो स्थिति काफ़ी हास्यप्रद भी होती दिखायी पड़ती रही है । देश स्वतंत्र हुआ, अपना संविधान लागू हुआ जिसने समान नागरिक संहिता की भी कल्पना की गई किंतु यह संहिता सबसे पहले सरकारी क्रमचारियों पर लागू की गई वो भी ऐसे कि कर्मचारी अपनी इच्छा से हिल भी न सके । आज ७५ वर्ष होने पर समान नागरिक संहिता पर चर्चा होने लगी है लेकिन इसमें भी परदे के पीछे राजनीतिक और धार्मिक दृश्य अधिक दिखायी देते हैं । आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि समस्या के मूल को कोई समाप्त करना नहीं चाहता । सरकार समान नागरिक संहिता का ढिंढोरा ज़रूर पीटती है लेकिन स्वयं जातिगत क़ानून, जातिगत आरक्षण और जातिगत गणना करके जातियों के आधार पर असमान व्यवहार करती है । देश की राजनीतिक व्यवस्था की और ध्यान दें तो पूरी व्यवस्था में असमानता भरी पड़ी है और सभी राजनीतिक दल जाने अनजाने अथवा राजनीतिक विवशता के कारण इस व्यवस्था को संरक्षण देते रहे हैं।

जब राजनेता ही आदर्श आचरण का पालन नहीं करेंगे तो जनता से कैसे अपेक्षा कर पाएंगे। ऐसी स्थिति का एक मुख्य कारण यह भी है कि देश में आज तक कोई आदर्श राजनीतिक आचार संहिता का निर्माण नहीं हुआ। यही कारण है कि कभी माननीय धन के लेनदेन के आरोपी बनते हैं तो कभी धन के बदले प्रश्न पूछने के दोषी पाए जाते हैं। कोई संसद में सोता दिखाई पड़ता है तो कोई आंख मारता । एक सज्जन तो जाकर प्रधान मंत्री के गले लिपट जाते हैं । विरोध करना हो तो सारी शिष्टता ताक पर रख दी जाती है । अशिष्ट शब्दों का प्रयोग तो जैसे इनका जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है । यदि नीतिगत विरोध करना है तो पहले अपनी बात जनता के बीच ले जाएँ और जनता का समर्थन प्राप्त करें लेकिन जनता के प्रतिनिधि होकर असभ्य आचरण कर उसी जनता का सर नीचे झुकाने से नहीं चूकते। ख़ुद के महल रेत की नीव पर काँच के भले बने हों लेकिन दूसरों के महल पर पत्थर मारने का स्वभाव नहीं जाता ।

यदि वास्तव में देश में समान नागरिक संहिता का सचार करना है तो देश के विशेष नागरिक होने के नाते माननीयों को सर्वप्रथम स्वयं अपने आचरण में सुधार करना होगा और यह तभी संभव है जब देश में एक समान राजनीतिक आचरण संहिता का निर्माण कर सख्ती से पालन कराया जाय। इसके लिए सरकार को मजबूत इच्छा शक्ति के साथ आगे बढ़ना होगा। इसके लिए यहाँ कुछ सुझाव दिए जा रहें हैं जिन्हें क़ानूनी लिबास पहनाकर सही अर्थों में समानता के सिद्धांत पर आगे बढ़ा जा सकता है ।

१ सभी माननीयों को जनसेवकों के समान आचरण संहिता के अधीन लाया जाए।
२ केवल निर्वाचन क्षेत्र के ही स्थायी निवासी को चुनाव लड़ने की अहर्ता प्राप्त हो।
३ प्रत्येक माननीय के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारित हो,इसके साथ ही मताधिकार के लिए भी न्यूनतम योग्यता हाई स्कूल उत्तीर्ण आवश्यक की जाय जिससे सरकार में गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके ।
४ किसी भी उम्मीदवार के विरुद्ध किसी आपराधिक जांच के चलने अथवा पुलिस रिपोर्ट पंजीकृत होने की दशा में उच्चतम न्यायालय , चुनाव आयोग और ग्रह विभाग के प्रतिनिधियों की एक नामित समिति से संयुक्त अनुमति लेना आवश्यक हो । किसी भी दशा में ज़ेल से चुनाव लड़ने की अनुमति न हो।
५ निर्वाचन क्षेत्रों का जातिगत आरक्षण समाप्त हो। विशेष समुदाय का प्रतिनिधित्व न होने की दशा में उस समुदाय के प्रतिनिधि का मनोनयन किया जा सकता है ।
६ किसी भी परिवार के एक ही सदन में एक से अधिक सदस्य के चुनाव/मनोनयन को प्रतिबंधित किया जाय। इसके साथ राज्य सभा की सदस्यता अधिकतम तीन संसदीय अवधि तक सीमित हो । राज्यसभा सदस्यता के लिए किसी विषय में न्यूनतम स्नातकोत्तर डिग्री आवश्यक होनी चाहिए
७ क्षेत्रीय पार्टी को केवल प्रदेश स्तर तक ही चुनाव के लिए अनुमति दी जाय । संसद हेतु केवल राष्ट्रीय पार्टी के उम्मीदवार ही अधिकृत हों।
८ विधान सभाओं, संसद , सचिवालय और जिलाधीश कार्यालय कैंपस को किसी भी प्रकार के प्रदर्शन, नारेबाज़ी, हड़ताल अथवा अनशन के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करें। इस तरह के आयोजन और रैलियों के लिए ज़िला , प्रदेश और केंद्र स्तर पर विशेष स्थान निश्चित किए जाएँ । बाज़ार और सार्वजनिक मार्गों पर किसी प्रकार का आयोजन प्रतिबंधित हो । ज्ञापन लेने के लिए प्रत्येक स्तर पर ज्ञापन अधिकारी नामित किए जायें। साथ ही प्रत्येक ज्ञापन पर सक्षम अधिकारी ३० दिन के अंदर अपना प्रतिवेदन /निर्णय सार्वजनिक रूप से घोषित करने के लिए बाध्य हों।
९ देश की छवि धूमिल करने के पर्यास , देश और सेना के के विरुद्ध कोई बयान देना , किसी भी धर्म के प्रति घृणा भरे शब्दों का प्रयोग , वेध धार्मिक स्थलों पर आक्रामक तोड़फोड़ को देश विरोधी अपराध घोषित किया जाय और दोषी के मताधिकार पर दस वर्षों का प्रतिबंध लगे।

१० किसी भी सदन के सदस्यको आबंटित समय में बोलते समय किसी भी सदस्य द्वारा किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न करना आपत्तिजनक आचरण की परिधि में लाया जाय और अध्यक्ष द्वारा दोषी पाए जाने पर दोषी सदस्य को तुरंत सदन से बाहर किया जाना चाहिए । यदि किसी सदस्य को आपत्ति दर्ज करनी हो तो वह वक्तव्य पूर्ण होने पर अपनी आपत्ति दर्ज कर सकता है और अध्यक्ष की अनुमति से अपना पक्ष रख सकता है।

११ प्रत्येक माननीय द्वारा प्रत्येक वर्ष के लिए अपनी चल – अचल संपत्ति का ब्योरा आयकर विवरणी के साथ प्रस्तुत करना अनिवार्य हो ।

१२ सभी माननीयों जिन्हें वेतन / मानदेय /भत्तों का भुगतान होता है, का कार्य पूर्णकालिक मानते हुए उनके लिए सरकारी सेवकों की भांति अतिरिक्त व्यवसाय प्रतिबंधित हो ।

१३ राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए आवश्यक सख्त कदम उठाए जायें । इसी के अंतर्गत राजनीतिक नेताओं और पार्टियों के लिए विदेश में बैंक खाता खोलने और किसी प्रकार का धन प्राप्त करना प्रतिबंधित हो ।

 

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जातिवाद और क्षेत्रवाद का भेद , कथनी और करनी । https://tirangaspeaks.com/castismkesherwaad/?utm_source=rss&utm_medium=rss&utm_campaign=castismkesherwaad Wed, 05 Feb 2025 16:11:38 +0000 https://tirangaspeaks.com/?p=97   वैसे तो हमारा देश राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत नागरिकों से भरा पड़ा है लेकिन यदि उत्तराखण्ड की बात करें तो शायद यह प्रदेश देश सेवा में अग्रणी निकले। पहाड़ का शायद ही कोई परिवार होगा जिसके किसी न किसी सदस्य ने किसी न किसी सैनिक बल के माध्यम से देश की सेवा न की हो [...]

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वैसे तो हमारा देश राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत नागरिकों से भरा पड़ा है लेकिन यदि उत्तराखण्ड की बात करें तो शायद यह प्रदेश देश सेवा में अग्रणी निकले। पहाड़ का शायद ही कोई परिवार होगा जिसके किसी न किसी सदस्य ने किसी न किसी सैनिक बल के माध्यम से देश की सेवा न की हो । राजनीति की बात करें तो भी इस प्रदेश का योगदान किसी से कम नहीं । गोविंद बल्लभ पंत, हेमवतिनंदन बहुगुणा , नारायण दत्त तिवारी जैसे प्रखर नेता हमारे देश को इसी प्रदेश की देन है।

पहले ऐसा सुनने में बहुत कम आता था कि जनता और नेता किसी जाति विशेष अथवा क्षेत्र विशेष के नाम पर राजनीति करें लेकिन इधर कुछ वर्षों से इसका चलन बढ़ता जा रहा है। नेहरू सरकार ने भले ही क्षेत्र विशेष को कुछ विशेष अधिकार देकर इस राजनीति के बीज बहुत पहले ही बो दिये हों लेकिन लंबे समय तक देश ऐसी भावना को दरकिनार करता रहा । आरक्षण के नाम पर भले किसी समुदाय को मुख्य धारा से अलग रखा गया हो परंतु किसी भी समुदाय में घृणा का स्थान कभी बन नहीं पाया । धीरे धीरे देश में राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बढ़ते नये नये छोटे राजनीतिक दलों का आगमन हुआ जिनकी राजनीतिक सोच राष्ट्र से संकुचित होकर प्रदेश तक सिमट गई और आगे जो राजनीतिक विकास हुआ उसने राजनीति का दायरा बेहद सिकोड़कर जातिगत , धार्मिक और क्षेत्र विशेष तक छोटा कर दिया ।

आज गिने चुने राजनेता हैं जो अपना राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव रखते हैं। अन्यथा कोई मुस्लिम नेता है तो कोई दलित की राजनीति करता है। कोई खलिस्तान की बात करने में गर्व महसूस करता है तो कोई चीन पाकिस्तान को अपना माई बाप समझकर भारत की और आँखें तरेरता दिखायी देता है। जातिवाद, धर्म और क्षेत्र हमारे चुनाव जीतने के आधार बन रहे हैं । कोई साम्यवाद की बात करता है तो कोई अपने को समाजवादी कहकर गर्व का अनुभव करता है। गांधी जी , राजा राम मोहन राय, आज़ाद और भगत सिंह के आदर्शों की दुहाई देने वाले राष्ट्र को भूलकर अपनी जाति पर केंद्रित होते जा रहे हैं।आरक्षण के नाम पर अनगिनत जातीयाँ आपस में भेद भाव कर रही हैं। आश्चर्य और दुख की बात यह है कि छोटे राज्य भी अपनी ही सीमा में क्षेत्रवाद , जातिवाद और धार्मिक भेदभाव का शिकार हो रहे हैं । स्वर्ग से यह नजारा देख हमारे संविधान के निर्माता और मूल विचारक कितनी लज्जा महसूस करते होंगे जिन्होंने संविधान का आरंभ ही “हम भारत के नागरिक” से करते हुए भारत के किसी भी नागरिक को भारत में कहीं भी रहने और कारोबार करने की स्वतंत्रता दी थी । शायद ही कोई सच्चा भारतीय नागरिक होगा जो कश्मीर की इसी दशा के दुष्परिणामों से खुश होता हो। सरकार ने कश्मीर से धारा ३७० और ३५ ए हटा दी तो पूरा देश ख़ुशी से झूम उठा। स्पष्ट था कि हमारी अंतरात्मा कश्मीर की उस अलगाववादी सोच को स्वीकार नहीं कर रही थी ।

यदि आपसे कोई पूछे कि आप कहाँ के नागरिक हो तो गर्व से कहते हो “ भारत के” फिर आपका राज्य , आपका क्षेत्र और आपकी जातीय पहचान कहाँ छुप जाती है? क्या एक राज्य में रहते हुए आपका किसी दूसरे राज्य से कोई संबंध नहीं ? क्या उत्तर दक्षिण पूरब और पश्चिम के बीच कोई सीमाएँ निर्धारित हैं? जरा सोचिए , उत्तराखण्ड के जन्म की तो बात छोड़ दीजिए , आज़ादी से भी पूर्व क्या इस प्रदेश में दूसरे राज्यों के निवासी निवास एवं रोज़गार नहीं करते थे ? क्या यहाँ के निवासी दूसरे राज्यों के स्थानों पर रोज़गार की तलाश में पलायन नहीं करते थे ? क्या यह सिलसिला अब रुक गया है? राज्य की सीमाओं को सील करने, राज्य में ही दो क्षेत्रों गढ़वाल और कुमायूँ को वैचारिक स्तर पर अलग करने, ब्राह्मण और राजपूत की राजनीति करने, नागरिकों को पहाड़ी और देशी में विभक्त करने से आप कौन सी फसल उगा रहे हैं । अपने ही देश से लगभग दूर हो जाना चाहते है ? प्रदेश को और कितने टुकड़ों में बाँटना चाहते हैं। देश में हिंदू राष्ट्र और हिंदू एकता की बात करने वाले अपने ही परिवार को खोखला कर कमजोर करने पर तुले हैं ।

इतिहास देखिए और बताइए कि क्या देहरादून को बनानेवाले आचार्य द्रोण और गुरु राम राय अपने को पहाड़ी मानकर बसाने आये थे । और अन्य महापुरुषों की बात करें तो क्या उन्होंने भी ऐसा ही सोचा था ?

यह सोच केवल उत्तराखंड में पैदा हो रही हो , ऐसा बिलकुल नहीं है बल्कि पूरे देश में यही नफ़रत की फसल उगाई जा रही है। देश को एक दो नहीं हज़ारों टुकड़ों में बाँटने की साजिस अपना काम कर रही है। उत्तराखण्ड एक देवभूमि है जहां से संस्कारों की गंगा बह कर पूरे देश को पवित्र करती है। प्रदेश सांस्कृतिक रूप से देश का नेतृत्व करता है फिर ऐसा सांस्कृतिक प्रदूषण हमें कहाँ लेकर जाएगा ? जैसा मैंने पहले कहा कि इस प्रदेश का एक एक परिवार अपने भारत देश के लिए जान छिड़कता है। सेना के सर्वोच्च अधिकारी हमारे इसी प्रदेश का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक और हम पी ओ के को भारत में मिलाने की बात करते हैं और दूसरों और ख़ुद को ही भारत से दूर कर लेना चाहते हैं ।

टी वी पर उत्तराखंड के समाचार देख सुन रहा था । दिल के कोनों में समाचार सुन अफ़सोस और दुख हो रहा था। में स्वयं ५० वर्षों से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भा ज पा ( पहले जन संघ ) से वैचारिक रूप से जुड़ा हूँ लेकिन कभी ऐसी स्थिति नहीं देखी । क्या बेटा बड़ा होकर यूँ ही बाप के ओचित्य को चुनौती देता है? यदि ऐसा है तो हम किस संस्कृति का रोना रोते हैं ? संगठन के पद हों अथवा चुनाव के प्रत्याशी , संघ और पार्टी संगठन के मतभेद खुलकर सामने आना निश्चय ही चिंता में डालने वाला है। एक अर्ध शताब्दी के बाद भारत की जनता को स्वाभिमान और अभिमान की अनुभूति हुई है। देश विश्वगुरु बनने का आकांक्षी है। यदि इस तरह के मतभेद बढ़ते रहे तो देश की बर्बादी इसी के सुपुत्रों द्वारा लिखी जाएगी ।

आइये अपने मन के भीतर झांकिये वहाँ एक सच्चा देश भक्त और देव पुरुष बैठा है। उसे पहचानिए , उसका निरादर मत करिए । वो आपकी आत्मा है उसके बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं है। जातिवाद , क्षेत्रवाद जैसी संकुचित सोच से बाहर निकलये । कुछ बड़ा बनिये , बड़ा करिए । बड़े परिवार की महत्ता को समझये। देश ही हमारा परिवार, नगर, क्षेत्र और प्रदेश है। भारतीय हमारी नागरिकता है, सोच और संस्कृति है। यही हमारी जाति और पहचान है। जो आगे बढ़ेगा देश के लिए करेगा । देश है तो हम हैं । इसे वैचारिक, भाषाई, सांस्कृतिक , क्षेत्र और जातियों में बाँटकर कमजोर मत कीजिए ।

हमे देश में कहीं भी बसने और रहने का अधिकार है तो दूसरों को भी हमारे यहाँ उतना ही सम्मान मिलना चाहिए ।यदि उत्तराखण्ड से जाकर उत्तर प्रदेश में योगी जी देश का नाम रोशन कर सकते हैं , गुजरात से आदरणीय मोदी जी, अमित शाह , मध्यप्रदेश से शिव राज सिंह चौहान , हरियाणा के देवी लाल , दक्षिण से आदरणीय निर्मला सीता रमन , महाराष्ट्र , आसाम और कर्नाटक के अनेक नेता देश की सेवा कर सकते हैं , उत्तराखण्ड के श्री अजीत डोभाल, विपिन रावत और अन्य बहुत से नायक देश की सुरक्षा की गारंटी दे सकते हैं तो आप भी ऐसे ही चरित्रों का अनुशासनात्मक कर देश के निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

 

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