पिछले कुछ वर्षों से कुछ माननीयों का अशोभनीय आचरण देश के नागरिकों के लिए आश्चर्य का विषय बनता रहा है । कई बार तो स्थिति काफ़ी हास्यप्रद भी होती दिखायी पड़ती रही है । देश स्वतंत्र हुआ, अपना संविधान लागू हुआ जिसने समान नागरिक संहिता की भी कल्पना की गई किंतु यह संहिता सबसे पहले सरकारी क्रमचारियों पर लागू की गई वो भी ऐसे कि कर्मचारी अपनी इच्छा से हिल भी न सके । आज ७५ वर्ष होने पर समान नागरिक संहिता पर चर्चा होने लगी है लेकिन इसमें भी परदे के पीछे राजनीतिक और धार्मिक दृश्य अधिक दिखायी देते हैं । आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि समस्या के मूल को कोई समाप्त करना नहीं चाहता । सरकार समान नागरिक संहिता का ढिंढोरा ज़रूर पीटती है लेकिन स्वयं जातिगत क़ानून, जातिगत आरक्षण और जातिगत गणना करके जातियों के आधार पर असमान व्यवहार करती है । देश की राजनीतिक व्यवस्था की और ध्यान दें तो पूरी व्यवस्था में असमानता भरी पड़ी है और सभी राजनीतिक दल जाने अनजाने अथवा राजनीतिक विवशता के कारण इस व्यवस्था को संरक्षण देते रहे हैं।
जब राजनेता ही आदर्श आचरण का पालन नहीं करेंगे तो जनता से कैसे अपेक्षा कर पाएंगे। ऐसी स्थिति का एक मुख्य कारण यह भी है कि देश में आज तक कोई आदर्श राजनीतिक आचार संहिता का निर्माण नहीं हुआ। यही कारण है कि कभी माननीय धन के लेनदेन के आरोपी बनते हैं तो कभी धन के बदले प्रश्न पूछने के दोषी पाए जाते हैं। कोई संसद में सोता दिखाई पड़ता है तो कोई आंख मारता । एक सज्जन तो जाकर प्रधान मंत्री के गले लिपट जाते हैं । विरोध करना हो तो सारी शिष्टता ताक पर रख दी जाती है । अशिष्ट शब्दों का प्रयोग तो जैसे इनका जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है । यदि नीतिगत विरोध करना है तो पहले अपनी बात जनता के बीच ले जाएँ और जनता का समर्थन प्राप्त करें लेकिन जनता के प्रतिनिधि होकर असभ्य आचरण कर उसी जनता का सर नीचे झुकाने से नहीं चूकते। ख़ुद के महल रेत की नीव पर काँच के भले बने हों लेकिन दूसरों के महल पर पत्थर मारने का स्वभाव नहीं जाता ।
यदि वास्तव में देश में समान नागरिक संहिता का सचार करना है तो देश के विशेष नागरिक होने के नाते माननीयों को सर्वप्रथम स्वयं अपने आचरण में सुधार करना होगा और यह तभी संभव है जब देश में एक समान राजनीतिक आचरण संहिता का निर्माण कर सख्ती से पालन कराया जाय। इसके लिए सरकार को मजबूत इच्छा शक्ति के साथ आगे बढ़ना होगा। इसके लिए यहाँ कुछ सुझाव दिए जा रहें हैं जिन्हें क़ानूनी लिबास पहनाकर सही अर्थों में समानता के सिद्धांत पर आगे बढ़ा जा सकता है ।
१ सभी माननीयों को जनसेवकों के समान आचरण संहिता के अधीन लाया जाए।
२ केवल निर्वाचन क्षेत्र के ही स्थायी निवासी को चुनाव लड़ने की अहर्ता प्राप्त हो।
३ प्रत्येक माननीय के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता निर्धारित हो,इसके साथ ही मताधिकार के लिए भी न्यूनतम योग्यता हाई स्कूल उत्तीर्ण आवश्यक की जाय जिससे सरकार में गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके ।
४ किसी भी उम्मीदवार के विरुद्ध किसी आपराधिक जांच के चलने अथवा पुलिस रिपोर्ट पंजीकृत होने की दशा में उच्चतम न्यायालय , चुनाव आयोग और ग्रह विभाग के प्रतिनिधियों की एक नामित समिति से संयुक्त अनुमति लेना आवश्यक हो । किसी भी दशा में ज़ेल से चुनाव लड़ने की अनुमति न हो।
५ निर्वाचन क्षेत्रों का जातिगत आरक्षण समाप्त हो। विशेष समुदाय का प्रतिनिधित्व न होने की दशा में उस समुदाय के प्रतिनिधि का मनोनयन किया जा सकता है ।
६ किसी भी परिवार के एक ही सदन में एक से अधिक सदस्य के चुनाव/मनोनयन को प्रतिबंधित किया जाय। इसके साथ राज्य सभा की सदस्यता अधिकतम तीन संसदीय अवधि तक सीमित हो । राज्यसभा सदस्यता के लिए किसी विषय में न्यूनतम स्नातकोत्तर डिग्री आवश्यक होनी चाहिए
७ क्षेत्रीय पार्टी को केवल प्रदेश स्तर तक ही चुनाव के लिए अनुमति दी जाय । संसद हेतु केवल राष्ट्रीय पार्टी के उम्मीदवार ही अधिकृत हों।
८ विधान सभाओं, संसद , सचिवालय और जिलाधीश कार्यालय कैंपस को किसी भी प्रकार के प्रदर्शन, नारेबाज़ी, हड़ताल अथवा अनशन के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित करें। इस तरह के आयोजन और रैलियों के लिए ज़िला , प्रदेश और केंद्र स्तर पर विशेष स्थान निश्चित किए जाएँ । बाज़ार और सार्वजनिक मार्गों पर किसी प्रकार का आयोजन प्रतिबंधित हो । ज्ञापन लेने के लिए प्रत्येक स्तर पर ज्ञापन अधिकारी नामित किए जायें। साथ ही प्रत्येक ज्ञापन पर सक्षम अधिकारी ३० दिन के अंदर अपना प्रतिवेदन /निर्णय सार्वजनिक रूप से घोषित करने के लिए बाध्य हों।
९ देश की छवि धूमिल करने के पर्यास , देश और सेना के के विरुद्ध कोई बयान देना , किसी भी धर्म के प्रति घृणा भरे शब्दों का प्रयोग , वेध धार्मिक स्थलों पर आक्रामक तोड़फोड़ को देश विरोधी अपराध घोषित किया जाय और दोषी के मताधिकार पर दस वर्षों का प्रतिबंध लगे।
१० किसी भी सदन के सदस्यको आबंटित समय में बोलते समय किसी भी सदस्य द्वारा किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न करना आपत्तिजनक आचरण की परिधि में लाया जाय और अध्यक्ष द्वारा दोषी पाए जाने पर दोषी सदस्य को तुरंत सदन से बाहर किया जाना चाहिए । यदि किसी सदस्य को आपत्ति दर्ज करनी हो तो वह वक्तव्य पूर्ण होने पर अपनी आपत्ति दर्ज कर सकता है और अध्यक्ष की अनुमति से अपना पक्ष रख सकता है।
११ प्रत्येक माननीय द्वारा प्रत्येक वर्ष के लिए अपनी चल – अचल संपत्ति का ब्योरा आयकर विवरणी के साथ प्रस्तुत करना अनिवार्य हो ।
१२ सभी माननीयों जिन्हें वेतन / मानदेय /भत्तों का भुगतान होता है, का कार्य पूर्णकालिक मानते हुए उनके लिए सरकारी सेवकों की भांति अतिरिक्त व्यवसाय प्रतिबंधित हो ।
१३ राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए आवश्यक सख्त कदम उठाए जायें । इसी के अंतर्गत राजनीतिक नेताओं और पार्टियों के लिए विदेश में बैंक खाता खोलने और किसी प्रकार का धन प्राप्त करना प्रतिबंधित हो ।
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