आज पूरी मातृशक्ति को अभिवादन और शुभकामनाएं देते हुए विचार आया की मातृ शब्द की उत्पत्ति का संबंध संतान उत्पत्ति और पालन से हैं तो क्यों न आज ऐसे विषय पर चर्चा करें जहाँ मातृशक्ति के प्रथम दायित्व का सीधा संबंध हो यानी हमारे बच्चे। आज जिस विषय पर चर्चा को आरम्भ किया जा रहा है वह दिखायी तो नहीं देता लेकिन गुप्त मारक की तरह शनै शनै हमारे जीवन के समस्याओं का मुख्य कारक बनते हुए हमारे भविष्य का विनाश कर रहा हे । यह कारक है मानसिकता , जिसे सभी माता-पिता अनजाने में महत्व नहीं देकर भयंकर भूल कर बैठते हैं ।
मनन कीजिए , अच्छा अथवा बुरा जैसा भी विचार हो अवश्य अपनी टिप्पणी हमें प्रेषित करें । शायद आपके सुझाव से हम इस विकट समस्या का निदान पाने में सफल हो सकें।
मानसिकता – अपराध की जननी
सावधान , तेजी से बदल रही हमारी मानसिकता जहाँ एक और नई सोच उत्पन्न कर रही हे, हम विकास की और बढ़ रहें हैं वहीं दूसरी और इसके घातक परिणाम भी सामने आने लगे हैं। आप समाचार पत्र देखिए अथवा दूरदर्शन पर ब्रेकिंग न्यूज़ , पति द्वारा पत्नी की हत्या, पत्नी के प्रेमप्रसंग के चलते पति की हत्या, दहेज के लिए बहू की हत्या, संपत्ति के लिए भाई द्वारा भाई की हत्या अब आम समाचार हो गए हैं । इसके साथ ही रातों रात अमीर बनने का ख्वाब , महंगे शौक़, नशा और अय्याशी नई पीढ़ी को अनैतिक मानसिकता की और खींच रहे हैं । पुरानी कहावत हे किसी परिवार को बर्बाद करना हो तो उसके बच्चों को बिगाड़ दीजिए , आपको कुछ नहीं करना हे, परिवार शनै शनै बर्बाद हो जाएगा। जरा सोचिए क्या इसी नीति से हमारे परिवार, देश को नष्ट नहीं किया जा रहा हे? दुश्मन धीरे से आपके घर में घुसकर आपको बर्बाद कर रहा हे और आप हँसते हँसते आत्महत्या कर रहें हैं।
आज नशे के कारोबार ने हमें कहीं न कहीं जकड़ लिया हे । दूध पीकर स्वस्थ रहने वाले बच्चों को नशे का ज़हर परोसा जा रहा है। उसे शिक्षा के साथ पहले धूम्रपान फिर अल्कोहल और फिर नशे की पुड़िया देकर चुपके चुपके नशे का आदि बना दिया जाता हे और यहीं से नई मानसिकता की नीव पड़ने लगती हे । अपनी भागदौड़ के चलते माता-पिता अपने बच्चों पर ध्यान केंद्रित नहीं करते । नहीं कह सकते कि यह मजबूरी हे अथवा अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीनता । लेकिन यह सत्य हे की अधिकतर मातापिता बच्चों के बदलते व्यवहार, उनकी मानसिकता से अनभिज्ञ रहते हैं और जब पता चलता हे तो देर हो चुकी होती हे । बच्चा पहले क्लास से बंक मारता हे फिर घर से मिले जेब खर्च से नशा सीखता हे । नशे की इच्छा और खर्च बढ़ने पर घर से पैसे चुराना सीखता हे और यही अनियंत्रित प्रवृत्ति उसे एक दिन अपराध की दुनिया में धकेल देती हे ।
मानसिकता पर ध्यान दें:
इस समस्या की कोई औषधि नहीं हे और न ही नकेंद्रन्द्र इसका समाधान है । केवल पारिवारिक वातावरण और मानसिकता पर ध्यान केंद्रित करने से अच्छे दूरगामी परिणाम प्राप्त ही सकते हैं। कुछ सामान्य सुझाव हैं जिनका पालन कर समस्या से निपटा जा सकता है ।
१ अपने बच्चों के व्यक्तित्व को पहचाने , उनके सीखने की परवर्ती और उनकी आंतरिक मश्तिष्कीय निपुणता शक्तियों को जानने का पर्यास करें। इसके लिए मनोवैज्ञानिकों की सहायता ली जा सकती हे । आज के वैज्ञानिक युग में डर्मैटोग्लाइफ़िक अध्यन के द्वारा भी इस प्रकार की जानकारी ली जा सकती है । सामान्य भाषा में इसे DMIT के नाम से जाना जाता है जो साधारण सी क़ीमत पर उपलब्ध हो जाता हे ।
२ अपने बच्चों पर अपनी निश्चित इच्छाएँ न थोपें और उन्हें उनके व्यक्तित्व के अनुसार विकसित होने में अपना सहयोग करें।
३ सभी माता पिता को अपने बच्चों से प्यार होता है । यह एक प्राकृतिक व्यवस्था है किंतु इसे आवश्यकता से अधिक दर्शाते हुए अपने बच्चों को ऐसे उपहार , शिक्षा न दें जो भविष्य में उनके जीवन में किसी दुष्परिणाम का कारण बने। उदाहरणार्थ बच्चों को मोबाइल उपलब्ध कराना , उचित आयु से पूर्व वाहन चलाने की अनुमति देना आदि।
४ अपने बच्चों की स्कूल की दैनिक गतिविधियों पर नज़र रखें।समय-समय पर स्कूल से उनकी फीडबैक अवश्य लें।
५ अपने बच्चों के व्यवहार पर निरंतर ध्यान केंद्रित करें। यदि बच्चे का पढ़ाई में मन नहीं लगता, बच्चे के सामान्य व्यवहार में परिवर्तन हो रहा हो , बच्चा एकांत ढूंड रहा हो , उसका स्वास्थ्य सामान्य स्तर से नीचे गिर रहा हो तो यह असामान्य स्थिति है जिस पर तुरंत सुधारात्मक उपायों की आवश्यकता है ।
६ अधिकतर मातापिता अपनी व्यस्तता अथवा अनभिज्ञता के कारण बच्चों के प्रति अपने उचित दायित्व के प्रति जागरूक नहीं होते। सभी बच्चे एक समान नहीं हो सकते । ध्यान दें और विश्वास करें कि आपका बच्चा किसी की कॉपी नहीं है । उसका जन्म विशिष्ट गुणों के साथ विशिष्ट कर्मों के माध्यम से विशिष्ट पहचान बनाते हुए विशिष्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हुआ है । उसे किसी अन्य की नक़ल , अनुसरण के लिए बाध्य न करें। अपने सपनों से अधिक उसके अपने भविष्य के मार्ग में उसके मार्गदर्शक बनें । कदापि बच्चे को अपने निश्चित लक्ष्य पर चलने के लिए बाध्य न करें बल्कि उसकी वैचारिक क्षमताओं को स्वतंत्रता देने का पर्यास करें।
७ बच्चों की आरंभिक आपराधिक हरकतों को कदापि संरक्षण न दें । बल्कि तुरंत उसे इसके दुष्परिणामों की जानकारी देकर सुधार करें।
माता-पिता अपने बच्चों की सर्वोच्च सफलता की कामना करता है । इसका अभिप्राय यह नहीं कि आपकी सोच उसके लिए सफलता का सही मार्ग साबित हो । जब तक व्यक्ति को उसके व्यक्तिगत गुणों और सोच के अनुसार व्यवसाय नहीं मिलेगा तब तक निश्चित मानिए वह भली प्रकार निष्पादन नहीं कर पाएगा । उचित निष्पादन और वांछित परिणामों की अनुपस्थिति में वह हमेशा ही विचलित स्थिति में रहेगा। उसे मानसिक संतुष्टि प्राप्त नहीं होगी । इसलिए उसकी सफलता का केवल एक ही सूत्र है कि अपने बच्चे को वह न बनाइए जो आप चाहते हैं बल्कि उसे वह बनने और व्यवसाय चुनने में सहायक बनें जिसके लिए ईश्वर ने उसे जन्मजात प्रतिभा देकर भेजा है ।
बच्चे हमारा भविष्य हैं , उनके उज्ज्वल भविष्य निर्माण में सकारात्मक योगदान हमारा दायित्व है इसे भलीभांति निभायें। अच्छे मातापिता बने , आपके बच्चे स्वयमेव अच्छे साबित होंगे।
Leave A Comment